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अपनत्व में प्रीति

*अपनत्व में प्रीति * प्रेम तो वास्तव में अपनत्व में ही होता है , जो निजतम हो अर्थात् आत्मियता अभिन्न हो वहीं ...निज रस में ही । परता - पराये तत्व में संभव ही नहीं प्रेम । पर की प्रति...

श्रीप्रिया चरण तृषित

*श्रीप्रिया चरण* श्रीप्रिया पद पद धरती ...श्रीप्रिया चरण आह  सखी री प्राण सर्वस्व श्रीप्रिया कोमल पद मकरन्द ! सहज सरल सरस उर-मंडल (हृदय) में बिहरते मेरी प्रिया के कोमल सुकोमल स...

रस चैतन्य तृषित

योगमाया की सेवा है लीलार्थ विस्मरण देना । जिससे तत्काल का रस प्रकट हो श्रीहरि को । निकुँज में वह रँगमय सँग होते श्रीप्रिया के क्योंकि निकुँज की सब लीला तत्सुखमयी है । तो वह...

हे कृष्ण हे कृष्ण हे कृष्ण - हे प्रेम

*हे कृष्ण हे कृष्ण हे कृष्ण - हे प्रेम* हे रसप्राण  ...हे प्राणवल्लभ ...हे प्रियतम ...हे जीवनधन ॥ हे प्रेमरँग प्राण मेरे हृदय में समा जाओ न प्यारे कि मैं तुम्हें पाकर तुमसे प्रेम कर स...

रूपमाधुरी नन्दतनय की ...

रूपमाधुरी नन्दतनय की ........ श्रीश्यामसुंदर की रूप माधुरी .......आहा ! क्या वर्णन संभव है श्रीप्यारेजू की अनिर्वचनीय रूपराशि का ....अनन्त सौंदर्य की अनन्त पयोधि श्रीकृष्ण रूप ........माधुर...

प्रेम में आराध्य की निजता अपनी होती है ...

प्रेम में आराध्य की निजता अपनी होती है ...... कहा गया कि स्पष्ट करुँ ! परंतु कभी कभी कुछ भाव ऐसे होते हैं जो मात्र ह्रदय से अनुभूत किये जा सकते हैं ..... इसे अनुभूत करने के लिये प्रेम की ...

प्रीति आभा

प्रीति आभा  ..... प्रीति की अपनी ही आभा होती है ....अपना ही विलास और विस्तार , जो सर्वत्र से हट केवल एक पर केंद्रित होती है , और पुनः तरंगवत फैलकर सबको समेट लेना चाहती है । प्यारा अथवा ...