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प्रेम के पँछी , युगल तृषित

प्रेम के पँछी  हो तो उड़ जाओगें  सागरों की धमनियों में  तैर जाओगें  फूलों को और मधु में भीगो जाओगे ... बसन्त में बरसते मकरन्द  ... देख पाओगे हर सुबह नए हो खिल जाओगें  सब रातों में उनकी बाँहों में पिघल पाओगे टपकते हुए मोती उड़ते हुए श्रृंगारों की  महकते गुच्छों में  धँसते जाओगें  खड्गों की झगरन को सरोद-सितारों की फिसलन सुनोगें  जब जो चखोंगे  अमृत ही कहोंगे जितने जलोगें  उतने रसीले पकोंगे  महारात्रि में समा  चेतन वेदी बनोंगे  आज्य हो तुम  रँग-पिचकारी भी बनोंगे  ... संसृतियों के प्रवाह में  ललित महोत्सवों के आमंत्रण छुओगें प्रचण्ड द्वन्द के कोहरे में  शरदित मेह केलि पहन सिहरोंगे  टपकोंगे ...  ... चरण तली में लिपटने को  प्राण-प्राण भर बरसोंगे  घूँघट में चहकोंगे  दृग कनीनिकाओं के रास बाँधोगे  हवाओं में उड़ते श्रवण पुटों को झुमकों में बाँध ... सचल प्रीत की ललित सजनी रहोंगे  छू गए जो प्रेम को जहाँ रहोंगे प्यासे रहोंगें  हो सकें पँछी , कहीं प्रेमी तो  अशान्त ह...
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श्री प्रिया हृदय निधि श्रीवृन्दावन , तृषित

*श्री प्रिया हृदय निधि श्रीवृन्दावन* श्री वृंदावन श्री वृंदावन श्री वृंदावन आहा........। श्री किशोरी जू का हृदय साकार प्रफुल्लित रससिक्त रसार्णव रससार आह्लाद का श्रृंगार महोदधि श्री वृंदावन ......। श्री रसिकों का उद्घोष श्री प्रिया जू का ही हृदय दर्शन है श्रीवृंदावन ...विलसते अनन्त सुख श्रृंगार । महाभाविनि का सेवार्थ निज प्रेम हेतु सुखालय ... अनन्त सरस उत्सवों के धर्ता-भर्ता श्रीविपिन राज और श्रीप्रिया हृदय प्रेम के अनन्त महाभावों का मूल उद्गम है ...अभिसारिणी श्रीप्रिया का श्रृंगारात्मक अभिसार ... अनन्त रस विलास निकुंजों से सुसज्जित श्रीविपिन । श्रीवृंदावन का रस मति का नहीं वरन केवल हृदय का विषय है सो मात्र हृदय में ही हृदयंगम होवे  यह भावराज्य , हृदय में श्रीयुगल स्वरूप को उनके सरस उत्सवों सँग कोई विराजने को उन्मादित हो उठे तो वह भीगे होते है श्रीविपिन के डाल-पात और फूल-फूल से गूँथते सुखों को भरने में । श्रीवृंदावन प्राकृत स्थान या भूमि भर का नाम ना है , यह तो श्री प्रिया के अनन्त प्रेम भावों का प्रकट श्रृंगारमय रसमय दर्शन है । भेद की सत्ता इस मायिक जगत में है , श्रीविपिन को दिय...

अपनत्व में प्रीति

*अपनत्व में प्रीति * प्रेम तो वास्तव में अपनत्व में ही होता है , जो निजतम हो अर्थात् आत्मियता अभिन्न हो वहीं ...निज रस में ही । परता - पराये तत्व में संभव ही नहीं प्रेम । पर की प्रति...

श्रीप्रिया चरण तृषित

*श्रीप्रिया चरण* श्रीप्रिया पद पद धरती ...श्रीप्रिया चरण आह  सखी री प्राण सर्वस्व श्रीप्रिया कोमल पद मकरन्द ! सहज सरल सरस उर-मंडल (हृदय) में बिहरते मेरी प्रिया के कोमल सुकोमल स...

रस चैतन्य तृषित

योगमाया की सेवा है लीलार्थ विस्मरण देना । जिससे तत्काल का रस प्रकट हो श्रीहरि को । निकुँज में वह रँगमय सँग होते श्रीप्रिया के क्योंकि निकुँज की सब लीला तत्सुखमयी है । तो वह...

हे कृष्ण हे कृष्ण हे कृष्ण - हे प्रेम

*हे कृष्ण हे कृष्ण हे कृष्ण - हे प्रेम* हे रसप्राण  ...हे प्राणवल्लभ ...हे प्रियतम ...हे जीवनधन ॥ हे प्रेमरँग प्राण मेरे हृदय में समा जाओ न प्यारे कि मैं तुम्हें पाकर तुमसे प्रेम कर स...

रूपमाधुरी नन्दतनय की ...

रूपमाधुरी नन्दतनय की ........ श्रीश्यामसुंदर की रूप माधुरी .......आहा ! क्या वर्णन संभव है श्रीप्यारेजू की अनिर्वचनीय रूपराशि का ....अनन्त सौंदर्य की अनन्त पयोधि श्रीकृष्ण रूप ........माधुर...